गुरुवार, 13 अक्तूबर 2016

देवधारा जलप्रपात जिला गरियाबंद

उदन्ती अभ्यारण्य के पास 


छत्तीसगढ़ को भी भगवान ने प्राकृतिक सौन्दर्य कूट कूट कर दिया है। सिवा बर्फ से ढके पर्वत के । ये हमारा दुर्भाग्य है की ह्म पूरी दुनिया तो घूमते रहते है।

किन्तु अपने पास के अनुपम सोंदर्य स्थल से अनजान रहते है. ऐसा ही एक स्थल है देवधारा जलप्रपात जिला गरियाबंद , जिससे कई मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।

वर्ष 2002 मे मै जिला रायपुर मे पदस्थ था मुझे अक्सर देवभोग ,मैनपुर एरिया के गाव मे अक्सर दौरे मे शासकीय कार्य वश जाना होता था । उड़ीसा से लगे देवभोग मार्ग पर उदंती अभयारण्य रायपुर से 140 कि.मी. की दूरी पर स्थित है । देवधारा जल प्रपात है, जिससे कई मान्यताएं जुड़ी हुई हैं. । 

मैनपुर से आगे मुख्य सड़क से थोडा ही हटकर बने इको सेंटर काफी खुबसूरत जगह पर बनी हुई है । वही पर रास्ते मे एक जगह पर देवधारा जलप्रपात :का लगा हुआ बोर्ड मुझे हमेशा ही आकर्षित किया करता था। गर्मी लगभग समाप्ति की ओर थी , मै अपने अधीनस्थो के साथ जब उसी सड़क मे दौरे पर जा रहा था तो मेरी नज़र पुनः उस बोर्ड पर नज़र पड़ी। 



आगे गाव पहुचने जब पर हमने उस झरने के बारे मे जानकारी लिया तो लोगो ने उस जगह की काफी तारीफ़ की तो हम लोगो ने विचार किया की वापिसी मे , जलप्रपात को देखते हुये हि जायेंगे ।
आपको बता दें कि गरियाबंद जिले की रत्नगर्भा धरती पर दो दशक पहले पांच हीरा खदानें यानी किंबरलाइट पाइप की खोज हुई थी। मध्यप्रदेश के जमाने में इसे कांटेदार तारों से घेर दिया गया इसी जंगलों से घिरा देवधारा जल प्रपात है, जिससे कई मान्यताएं जुड़ी हुई हैं
तौरेंगा से 17 कि.मी. की दूरी पर यह जलप्रपात है। यहां पहुचने के लिये लगभग 1.5 कि.मी. पैदल चलना पड़ता है। बांस एवं मिश्रित वन से घिरा हुआ यह स्थान बहुत ही मनोरम एवं एकांतमय है जहां झरने की कलकल ध्वनी से पहाड़ी गूंजती सी प्रतीत होती है। 
यह पर्यटकों के लिये पिकनिक का एक उत्तम स्थान है। बहुत बड़ी चट्टान के नीचे पूर्ण कटाव से ऐसा लगता है जैसे चट्टान आसमान में हों, नीचे गहरा जल भराव है। 40 फुट की उंचाई से गिरती जलधारा एवं पीछे दूर तक नदी में भरा हुआ जल एक अद्भुत दृश्य बनाता है। करीब मैनपुर के पायलीखंड, जांगड़ा, बेहराडीह, कोदोमाली, बाजाघाटी और कोसंबुरा गाव हैं।
यहां की पहाडिय़ां, घने वनों से आच्छादित हैं। इन वनों में साजा, बीजा, लेंडिया, हल्दु, धाओरा, आंवला, सरई एवं अमलतास जैसी प्रजातियों के वृक्ष भी पाए जाते हैं। वनभूमि घास, पेड़ों, झाडिय़ों व पौधों से ढंकी हुई हैं
पहाड़ी क्षेत्र में घूमने के लिए यह मार्ग अच्छी जगह है। यहा का रास्ता रोमांचक है ।कल कल करते मनोरम झरने यहां के नजारें आंखों को बहुत प्यारे लगते है,.जो एक बार यहां आ जाता है दोबारा आने की हसरत लिए वापस जाता है।
देवधारा जलप्रपात बहुत बड़ी चट्टान के नीचे पूर्ण कटाव से ऐसा लगता है जैसे चट्टान आसमान में हों, नीचे गहरा जल भराव है। 40 फुट की उंचाई से गिरती जलधारा एवं पीछे दूर तक नदी में भरा हुआ जल एक अद्भुत झील का सा दृश्य बनाता है। जो की इस जलप्रपात को और जलप्रपात की तुलना मे मनोरम बनाते है। देवधारा जलप्रपाततीन स्तरों मे दीखता है। पहला कुंड देवधारा और पीछे झील के रूप मे गिरता भाई दरहा ,और उसके पीछे नंदी दरहा के रूपमे जिससे कई मान्यताएं जुड़ी हुई हैं

पर्यटकों के लिए पिकनिक का यह अच्छा स्थान है। देवधारा के मुख्य नदी मोखानाला में पानी भरा हुआ रहता है।गर्मी के दिनों मे प्यासे जंगली जानवरों को इसके आस पास आसानी से देखा जा सकता है।
ट्रेकिंग ,कैम्पिंग के लिए यह एक अच्छा स्थान है .गर्मियो मे वन्य प्राणी आम तौर पर जंगल मे पानी के स्त्रोत के पास ही रहते हैं और यदि आपको प्रकृति से लगाव हो तो ऐसे मे पानी का स्त्रोत वहा रहने वाले हर जीव की खबर आसानी से दे देता है ।
पक्षियों की 12 से भी ज्यादा प्रजातियां यह पर पाई जाती हैं, जिनमें से कई प्रवासी पक्षी शामिल हैं। इनमें से कुछ हैं जंगलीमुर्गे, फेजेन्ट, बुलबुल, ड्रोंगो, कठफोड़वा आदि।
अगली सुबह ह्म वहा पहुच कर गाड़ी जहा पहुच पायी मे जाकर खड़े किये और पैदल चाल पड़े नाले के रास्ते मे पहुचने पर सबसे पहले हमे नेवले के दर्शन हुये ।
आगे बढ़ते हुये हम वन्यप्राणियो के पैरो के निशान की और हीरे की भी बीच बीच मे चमकीले पत्थरों कही मिल जाये सोच कर मुयायना कर लेते थे ।
.आगे बढ़ने पर सांभर सियार भालू आदी जानवरों के पैरों के निशान तो मिल हि रहे थे। उदंती ऐसा विरल बीहड़ स्थल है, जहां सबसे बड़ेस्तनपायी प्राणियों में से एक जंगली भैंसा व गौर(बायसन) एक साथ देखे जा सकते हैं। तभी पत्तो की ओट से झाकता हुआ हिरण का बच्चा हमेनज़र आया जो पास पहुचते ही कूद फांद करते हुये भाग गया .
वहां पर भगवान श्री राम,भाई लखन और पत्नी सीता के साथ आये थे यहां पर सीता माता के पैरो के निशान है ऐसी लोक मान्यता है .जो की विचित्र कलाकृति के रूप मे है।.उबड़ खाबड़ रास्ते पर तरह तरह के चट्टाने नज़र आती है .यह देवी का स्थान माना जाता है           स्थानीय  लोग  इसे देवी सीता जी के पैरो के निशान मानते है
बताते है की इस जगह पर एक बड़ी आकार की मछली है जिसे की देवी का अवतार माना जाता है ,कहते है वो सच्चे मन वाले , किस्मत वालो को ही नज़र आता है .ऐसी भी मान्यता है की यहां के जल पर नहाने से काफी बीमारियों से मुक्ति भी मिलती हैं। प्रकृति प्रेमियों के लिए इन जगहों पर जाने का सबसे अच्छा समय अगस्त से दिसंबर तक है। इस वाटर फॉल को देखकर पर्यटक खासे रोमांचित होते हैं और जो एक बार यहां आ जाता है दोबारा आने की हसरत लिए हि वापस लौटता है।

                                         इको सेंटर मैनपुर 

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर यात्रा लेख शर्मा जी।
    वन और जल प्रपात के बारे पढ़ कर ही अच्छा लगा वैसे कितना सूंदर होगा।
    Sachin3304.blogspot.in

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