शनिवार, 3 जून 2017

मनीराम एक अकेला व्यक्ति जिसने पर्यावरण की रक्षा में सागोन पेड़ का रोपण करने की सजा पाकर आज करोडो रूपये की संपत्ति आने वाली पीढ़ी के लिए छोड़ गया ........

मनीराम प्लांटेशनबार नवापारा से लगे देवपुर के जंगल


 (बार नवापारा से लगे देवपुर के जंगल)

अभी हॉल में मैंने श्री अनुराग मिश्र जी का इतिहास में गुम हो रहा110 बरस का सागौन जंगल मनीराम प्लांटेशन के सन्दर्भ में लेख देखा .और चुकी अनेको बार इस जगह को मैंने भी स्वयं देखा है .....

राज्य सरकार और वन महकमा यह कहकर अपनी पीठ ठोंक लेता है कि हमने लाखों पौधे लगाए, भले ही पौधे जीवित बचें या नहीं। हकीकत में छत्तीसगढ़ में जिसने प्लांटेशन की शुरुआत की और जिसकी याद में आज भी सागौन वेरायटी का नाम रखा गया है, उसे सरकार और वन महकमे ने भुला दिया। जी हां, हम बात कर रहे हैं, मनीराम प्लांटेशन की। पौने तीन मीटर मोटाई वाले सागौन के पेड़ के जंगल, जो अब खत्म होने को हैं। प्रशासन की उदासीनता से पूरा जंगल इतिहास से गुम हो जाएगा।
रायपुर. बार नवापारा से लगे देवपुर के जंगल का एक हिस्सा सागौन की खास किस्मों के लिए जाना जाता है। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान मनीराम नाम के एक बीटगार्ड ने सागौन का यह जंगल तैयार किया था, जिसकी उसे सजा दी गई। मध्यप्रदेश सरकार ने तो मनीराम के पोते को सम्मानित कर अपना हक अदा कर दिया पर छत्तीसगढ़ सरकार ने पूछा भी नहीं। मनीराम प्लांटेशन की अब इतनी दुर्गति हो गई कि कुछ साल में नामोनिशान खत्म हो जाएगा।
पौने तीन मीटर की मोटाई और 28 मीटर तक ऊंचे मनीराम के सागौन देखकर लोग दांतों तले ऊंगली दबा लेते हैं। आज से 110 साल पहले मनीराम ने देवपुर के जंगल में सागौन के पौधे रोपे थे। जानकार इसे हरा सोना कहा जाने वाला सागौन रोपने की शुरुआत मानते हैं। प्लांटेशन की नींव रखने वाले मनीराम की गांववाले पूजा करते हैं। उसी जंगल में एक पत्थर को मनीराम का प्रतीक मानकर हर त्योहार में पूजा जाता है। वन विभाग ने सिर्फ एक बोर्ड लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली, फिर मुड़कर नहीं देखा। आज मनीराम के लगाए पौधे एक-एक कर जड़ समेत नीचे गिर रहे हैं। महकमे की लापरवाही से बड़ा रकबा सिमटकर एक एकड़ भी नहीं बचा। आसपास खेत बन गए हैं। मनीराम के लगाए खास किस्म के पेड़ तो अब उंगलियों में गिने जा सकते हैं। सौ पेड़ अब सिर्फ तीन ही रह गए, जो अपनी वजन के कारण अब गिरने को है। वन महकमे ने खास किस्मों को सुरक्षित रखने की पहल भी नहीं की। देवपुर और बार नवापारा में सागौन के ऐसे पेड़ और कहीं नहीं हैं, जो मनीराम ने लगाए थे। मनीराम प्लांटेशन का प्रचार भी नहीं किया गया कि ऐतिहासिक प्लांटेशन तक पर्यटक पहुंचे। वन विभाग के पुराने फारेस्ट गार्ड को छोड़ दें तो कोई मनीराम प्लांटेशन के बारे में जानता भी नहीं। पर्यटन विभाग की भी किताब में इसका उल्लेख नहीं है।
तब मिली शांति
गिधपुरी गांव के लोगों का कहना है कि नौकरी से निकाले जाने के बाद मनीराम पागलों की तरह भटकने लगा था, फिर उसकी मौत हो गई। मरने के बाद उसकी आत्मा जंगल और गांव में भटकती थी, जिसे बैगाओं ने मिलकर मनीराम प्लांटेशन के बीच ही एक बरगद के पेड़ में स्थापित किया। इसके बाद उसकी आत्मा शांत हुई और भटकना बंद किया। होली, दिवाली, हरेली सभी त्योहारों में उसकी पूजा की जाती है।
आज भी हैं अवशेष
पिथौरा ब्लाक के कुम्हारीमुड़ा निवासी मनीराम बीटगार्ड था और गिधपुरी के पास ही बेरियर में उसकी पोस्टिंग थी। जहां बेरियर था, वहां की जगह उथली है। बेरियर के पास कुआं भी था, जो आज पट गया है, लेकिन कुआं की निशानी आज भी बाकी है। कुएं के पास ही आम के पेड़ हैं, जो जीवित हैं। गांववालों का कहना है कि पेड़ में आज भी काफी फल लगते हैं। आम के पेड़ काफी मजबूती से जमे हुए हैं।
अब कोई देखने भी नहीं आता
गिधपुरी निवासी कुंजराम बुड़ेक का कहना है कि लंबा अरसा बीत गया है, कोई अब मनीराम प्लांटेशन देखने भी नहीं आया। 17 साल पहले मध्यप्रदेश शासनकाल में मंत्री शिवनेताम ने मनीराम के पोते प्रेमसिंह का सम्मान किया था। फिर लोग प्रेमसिंह को भी भूल गए। अब उसका भी निधन हो चुका है। सिघरू गोंड़, जो बैगा भी हैं, बताते हैं कि मनीराम की आत्मा जंगल की रखवाली के लिए चिंतित थी। पूजा करने के बाद उसकी आत्मा तो शांत हो गई, लेकिन जंगल की रखवाली करने अफसर नहीं आए। गिधपुरी के ही प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक जनकराम दीवान और गोसाईराम साहू मनीराम प्लांटेशन का इतिहास नहीं जानते थे, लेकिन उनकी इच्छा है कि वे बच्चों को मनीराम प्लांटेशन का इतिहास बताएं और बच्चों को पौधरोपण की शिक्षा दें।

मनोज व्यास जी के भी सन्दर्भ में 

2 टिप्‍पणियां:

  1. घनघोर जंगलों के बीच यात्रा करने का आनन्द तब है जब हमें पेड-पौधों के बारे में ठीक-ठाक जानकारी हो।
    पौने तीन मीटर की मोटाई और 28 मीटर तक ऊंचे मनीराम के सागौन देखकर लोग दांतों तले ऊंगली दबा लेते हैं।
    अंगुली दबायेंगे ही, ऐसी प्रजाति आसानी से देखने को कहाँ मिलेगी।

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