बुधवार, 19 अक्टूबर 2016

गंगा इमली Camachile (Pithecellobium dulce) से जुडी यादे
कुछ साल पहले  की बात है ,मै  सुबह के समय अपने क्वार्टर मे  बैठा काम कर रहा था .तभी  क्वार्टर मे पीछे  के दीवार के तरफ पत्थर  गिरने  की आवाज़ आयी .मैंने अपने भृत्य  को आवाज़ दी ,देखो क्या हो रहा है . कुछ देर बाद मुझे  उसके  किसी को डाटने डपटने की आवाज़  आयी .फिर उसने आकर  बताया की   क्वार्टर  के  पीछे बाउन्ड्री  मे एक गंगा इमली,और  बेर का पेड़ है . बच्चे पत्थर  फेक कर उसे तोड़ने की कोशिस मे लगे रहते है .

अच्छा पीछे  गंगा इमली का पेड़ है  क्वार्टर  के बाउन्ड्री की और  नाला  होने से सुनसान रहता था .क्वार्टर  के बाउन्ड्री की और  नाला  होने से सुनसान रहता था .साथ ही  उसी और पुलिस ने हमारे रहते एक महिला नक्सली को एनकाउंटर मे मरने पर ला कर चुपचाप मजिस्ट्रेट की उपस्थिती  मे जला दिया था ताकि कही  कोई उसका शहीद  स्मारक न बना देवे . इसलिये भी   उधर ह्म लोग नही जाते थे .
सुनसान  और झाडिया होने से  कभी अजगर तो कभी नेवला आदि घुस आते थे इस लिए सामान्यतः  पीछे के दरवाजे  ह्म लोग  ज्यादा नही  खोलते थे और न ही उधर जाते थे ,इसलिए मुझे इस पेड़ के बारे मे  पता नही था .
उसने धीरे से मुझसे पूछा   तोड़ ले क्या साहब ,मैंने  ठीक है बोल. फिर अपने काम मे लग गया .
 करीब आधे घंटे मे वह गंगा इमली को  लेकर आ गया जिसे देख मुझे अपने  बचपन की  याद  आ गई . हम लोग इसे लाल इमली भी कहते थे. . और जब छुट्टियों मे  गाव जाते थे तो   इस पेड़  मे लगे फल की जानकारी  दोस्तों से मिलते ही इसे तोड़ने भागते थे .  इसका एक ही पेड़ था वो भी   दूर  नाले किनारे बेर  पेड़ के साथ और आसपास में बाबुल के पेड़ भी बहुत थे .   पेड बहुत बड़े थे और कटीले भी. इस कारण  ऊपर चढ़ने में परेशानी होती थी.और जैसे  तैसे इसके आकर्षण से बंधे पैर मे  हाथ मे कांटे भले ही चुभ जावे  किन्तु जाकर  डंडों   से फल लगे  शाखाओ पर  प्रहार कर गिराते जाते  थे, और अंत मे  मिल बाँट कर  ले आते थे ,फल को देख पहले तो माता जी प्रसन्न होती फिर हाथ पैर मे  काटो के खरोच देख डांट भी देती और आगे  उधर जाने के लिए मनाही भी .
अभी जब यह लेख लिख रहा था  तो मुझे पता चला की  भारत में,इसे कही कही  जलेबी इमली भी कहा जाता है . तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश , मध्यप्रदेश और दिल्ली में पायी जाती है । इसे मीठी इमली, थाई-मीठी इमली, जंगल जलेबी, बंदर फली आदि नाम से भी जानी जाती है ।
जलेबी इमली फरवरी के मध्य से मई माह तक पेड़ों पर लगती है । अधिकांश जलेबी इमली के पेड़ सड़कों के किनारे, राजमार्ग पर और छोटे गावों के आसपास लगे  आपको  दिख जाऐंगें । जलेबी इमली अपरिपक्व हरे रंग की दिखतीहै । पकने के बाद फल लाल और गुलाबी हो जाते हैं । फल के अंदर का गूदा या तो सफेद या फिर लाल गुलाबी होजाता है । इसके अंदर काले रंग के बीज निकलते हैं जिन्हें खाते समय बाहर निकाल दिया जाता है । इसका  स्वाद मीठा, खट्टा और मिट्टी की जैसे  होता है .

 कहते है इसके गुदा (पल्प ) मे  पोषक तत्व प्रोटीन व विटामिन आदि काफी अधिक मात्र मे पायी जाती है .  जंगल जलेबी इमली अन्य देशों जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका वेनेजुएला, ब्राजील, पेरू, गुयाना, कोलंबिया, मेक्सिको,जमैका, डोमिनिकन गणराज्य, हैती, गुआम, वर्जिन द्वीप समूह, डच एंटिल्स, क्यूबा, प्यूर्टो रिको, औरफ्लोरिडा और हवाई आदि में भी पाई जाती है और यह एशिया में, यह थाईलैंड, म्यांमार, मलेशिया, लाओस,चीन, फिलीपींस, इंडोनेशिया और भारत में  इसके पेड़ मिलते हैं ।
आज पुनः एक बार  में गंगा इमली देख कर मन प्रसन्न हो गया । .
फिलिप्पीन में न केवल इसे कच्चा ही खाया जाता है बल्कि   कई प्रकार के व्यजन बनाने में प्रयुक्त होता है.।
इस फल में प्रोटीन, वसा, कार्बोहैड्रेट, केल्शियम, फास्फोरस, लौह, थायामिन, रिबोफ्लेविन आदि तत्व भरपूर मात्र में पाए जाते हैं।. इसके पेड की छाल  के काढे से पेचिश का इलाज किया जाता है।.  त्वचा रोगों, मधुमेह और आँख के जलन में भी इसका इस्तेमाल होता है.। पत्तियों का रस दर्द निवारक का काम भी करती है और यौन संचारित रोगों में भी कारगर है . इसके पेड की लकड़ी का उपयोग इमारती लकड़ी की तरह ही किया जा सकता है।.

सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

 स्मृति स्तंभ बस्तर की जनजातियों पूर्वजो कीयाद मे       दंतेवाड़ा  गामवाड़ा ग्राम

पूर्वजो की याद में जीवन के अनेको रंगों में इतिहास को  दर्शाता हुआ  दो हज़ार साल पुराने  स्मृति स्तंभ स्मृति चिन्ह ) और बनाये जाने के कारण को  समझना है  तो आइये  पधारिये  बस्तर  में 



यदि आपकी दिलचस्पी आदिवासी जीवन को नज़दीक से समझने और जानने की हो तो इसके लिए बस्तर भी एक अच्छी जगह है। जहा पर जीवन के अनेको रंग आपके सामने आएंगे जो की बाकी दुनिया से अनूठीऔर अलग है।जन जातीय के जीवन जीने की अनोखी तरीकों का प्रतीक है। उनमें मृतक स्मृति चिन्ह खंभे, पूरे क्षेत्र में फैला हुआ है, जो बाहर की दुनिया से आने वालो किसी भी का ध्यान इस प्राचीन संस्कृति आकर्षक सीमेंट, पत्थर या लकड़ी के खंभे में किए गए नक्काशी ,पेंटिंग ,खुदाई की और आकृष्ट हो सकता है। जो की मृतक व्यक्ति के शौक उसके सपने, और जीवन शैली का स्मरण करते हुए मृत्यु के कारण के विवरण को भी दर्शाती है।यह बड़े पत्थरों के द्वारा बना स्मृति चिन्ह की संस्कृति मुख्य रूप से मुरिया जनजाति के द्वारा अपनाया गया है,





 बस्तर की मारिया और गोंड जनजातियों का इतिहास भी 3000 साल पुराना माना जा रहा है और यह शुरू हुआ मानव के विकास के दौरान कृषि कार्य की और बढ़ते चरण के शुरू से । इसके अवशेष तमिलनाडु, महाराष्ट्र, असम और यहां तक कि कश्मीर जैसे अन्य राज्यों में पाए गए। कई प्राचीन लकड़ी और पत्थर के खम्भों संरक्षण के लिए कहते हैं, वहीं एएसआई ऐसे ही एक Dilmili और Gamawada पर स्थित साइट संरक्षित किया गया है




दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से बचेली के मार्ग पर १२ km की दुरी पर गामवाड़ा ग्राम में सैकड़ो की संख्या में ऊँचे लंबे प्रस्तर स्तम्भ माड़िया जनजाति के लोग अपने पुरखो की याद में स्थापित किये हुए है। 2000 साल पुराने इन स्तंभो के प्रति ग्रामीण जनो में अपार श्रद्धा और सम्मान है। ईसा पूर्व की ये संरचनाए आज भी यहाँ अपने पूर्वजो की याद दिलाती है। जो उन्हें छोड़ कर प्रकृति में लीन हो गए है। यह पर नवाखानी के अवसर पर उनके सम्मान और आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध आयोजित कर  इस विधान में मृतको की याद में नए अन्न और उपज स्मारक पर अर्पित किया जाता है। आयोजन से पूर्व स्तम्भ से सम्बंधित पूरा परिवार मिलकर स्तम्भ के आसपास की पूरी सफाई करता है।
माड़िया समुदाय के लोग जरूरतों और परिस्थितयों के चलते अलग अलग जगहों पर निवास करने लगे है ,और उसी छेत्र में उनकी मृत्यु हो जाती है। परंतु मरणोपरांत मृतक की याद में स्तम्भ का निर्माण इसी कब्रगाह में किया जाता है। सैकड़ो की संख्या में स्थित ये स्तम्भ परिवार की मुखियाओ की याद में बनाये जाते है।
चुन कर चयन किये जाते है प्रस्तर
बस्तर की माडिया जनजाति की उपजातियो के अलग अलग गोत्रज के अलग अलग कब्रगाह होते है। जिसको बनवासी अपने पूर्वजो के याद में पहाड़ो और दुरूह इलाको से खोजकर लाये गये विशेष आकृति और विशेष आकार के प्रस्तरों को स्थापित करते है। विशाल आकार के इन पत्थरो को यहाँ स्थापित करना बड़े ही मशक्कत का काम है। जमीन के ऊपर जिस उचाई तक स्तम्भ दिखाई देते है अंदर भी उतना ही इन्हें गाड़ा जाता है।
मृतक के मृत्यु के कारण ,पसंद ,उसका ड्रीम भी बताता है
मृतक की याद में  बना स्तम्भ अनुभवी पुरातत्वविद् सीएल रैकवार, जिन्होंने बस्तर के स्मारक स्तंभों के  एक विशेषज्ञ  है ,के अनुसार मुग़ल शासक राजा अकबर और उसका परिवार  अपने स्वामित्व में  मृतको की याद  में बड़े खूबसूरत  भवन  पत्थरो से बना रखे है ,जहा  पर उन्हें दफनाया गया है।आदिवासियों का मुख्य जुड़ाव जंगल से रहा है इसलिए पहले वे लकड़ी उपयोग कर इसे बनाते थे। " इन स्तंभों को  दफन मृतक के सिर के साइड पर रखा जाता है। "
दिलचस्प नमूने स्तंभो में
हम  कुछ  स्तंभो में बाइक, कार, हवाई जहाज, घोड़े, पशु, बंदूकें, या पृथ्वी पर कुछ भी के चित्रों के साथ कंक्रीट खम्भों पर दिलचस्प नमूने पाते हैं जो न केवल उनके  शौक या पसंद दर्शाती  है, लेकिन ये  भी  बताता है वो कैसे मर गया, शराब या मलेरिया  से , शराब की बोतल , मच्छर की तस्वीर बना मरने  का    कारण भी  इन स्तंभों पर दर्शाया जाता  है।
सुकमा जिले के धुर नक्सल इलाके कोमाकोलेंग का  एक अद्भुत ऐतिहासिक स्तम्भ 
 इसी तरह सुकमा जिले के धुर नक्सल इलाके कोमाकोलेंग में में भी एक अद्भुत ऐतिहासिक स्तम्भ है । एकबारगी दूर से देखने पर यह स्तम्भ बस्तर में सामान्यतः बनाये जाने वाले मृतक स्तम्भो की भांति प्रतीत होता है ; किन्तु कही न कहीं उसके अनगढ़ चित्र  ऐतिहासिकता  के किसी भाग  को   प्रमाणित करती  है । दरअसल इस काष्ठ स्तम्भ पर फरवरी १९१० की तिथि अंकित थी जो स्पष्टतः बस्तर में हुए महान भूमकाल की ओर इशारा कर रही थी,आसपास के गांव वालो को रोककर जब हमने कुछ पूछने की कोशिश की तो वो डर कर भाग निकले अंततः एक बुजुर्ग ने अपनी भाषा में समझाते हुए उसे देवधामी बताया उसके अनुसार यहाँ पर बस्तर के देवता जो की आदिवासियों के राजा भी थे; ने कुछ राक्षसो को मार गिराया था उसी की स्मृति में यह काष्ठ स्तम्भ १०५ वर्ष पूर्व इस जगह पर लगाया गया था.
चित्र में बने हुए आदिवासी उसके ही पूर्वज है चेहरे से मिलान भी  
उस बुजुर्ग ने काष्ठ स्तम्भ में बने चित्रो को दिखाते हुए अपने चेहरे से मिलान भी करवाया और यह भी बतलाया की चित्र में बने हुए आदिवासी उसके ही पूर्वज है।



पुरुषों का है प्रतीक चिन्ह
लगभग 20000 squqre feet में फैले इस कब्रगाह मे सिर्फ पुरुषो के ही मृतक स्तम्भ बनाये जाते है। महिलाओ के मृतक स्तम्भ यहाँ स्थापित नही किये जाते। परिवार की मुखिया की याद में इन्हें बड़े ही विधि विधान से बड़े आयोजन कर स्थापित किया जाता है। महिलाये उनकी याद में उनके प्रति सम्मान प्रगट करने के लिए कब्र गाह में प्रवेश कर सकती है।
संरक्षण पुरातात्विक स्थल की
2000 वर्ष पुराने इन मृतक स्तंभो को प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल व अवशेष अधिनियम १९५८ के अन्तर्गत राष्ट्रीय महत्व का धरोहर घोषित किया किया गया है। तथा कब्रगाह के चारोओर को दीवारों से घेरकर सरंक्षण   किया गया है
स्मृति स्तंभ में  परिवार के किसी मृतक  सदस्य को याद  करना  त्योहार की तरह  है
संस्कृति विभाग  जगदलपुर  के अनुसार , "यह आदिवासियों का  स्मृति स्तंभ मृतक परिवार के किसी सदस्य को याद  करने के लिए एक त्योहार की तरह  है। परिवार गरीब है, आत्मा को आखिरी विदाई के भुगतान के लिए और कबीले के  लोगो को  आमंत्रित करने से पहले सभी संसाधनों और पैसे इकट्ठा करता रहता है। यदयपि  ऐसा  करने के लिए थोड़ा समय लगता है  । " अमीर लोगों में  30000 50 000 रुपये  लागत से  और महंगा खंभे बनाकर दिखाने के लिए  बैंड बाजा  के साथ एक जुलूस निकाल कर  घूमाते  हुए  तय  जगह में गड़ाते  है  । "
शहीद  स्तंभ
दिलचस्प बात यह है कि माओवादियों को भी विद्रोहियों वे मुठभेड़ों में खो दिया है और  वे उन्हें शहीद  कहते हैं। बस्तर  के अंदरूनी हिस्सों में इन स्तंभों  को बनाया गया है ऐसे  स्मृति स्तंभों पर भारत की  प्रतीकात्मक कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का चिन्ह  हंसिया और हथौड़ा के साथ लाल रंग में बनाया गया  हैं।
 बीजापुर जिले तक जगदलपुर, Tokapar, Bastanar, दंतेवाड़ा, Gamawada, Kodenar, Katekalyan से सड़क के दोनों किनारों पर  ध्यान देने योग्य  खड़े है। उनमें से ज्यादातर इन दिनों सीमेंट और पत्थर में बना रहे हैं, क्योंकि  आदिवासियों ने जान  बूझकर लकड़ी के खंभे के लिए पेड़ नहीं  काटने के लिए
 फैसला किया है।
संरक्षित स्मारक
Dilmili पर Gamawada पर और लकड़ी के खंभे पत्थर संरक्षित स्मारकों घोषित किया गया है के तहत प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल अवशेष अधिनियम, 1958, पुरातत्वविदों कहा कि यह एक प्राचीन विश्वास है ने कहा कि जब एक आदिवासी अपने ही वांछित अंतरिक्ष,  में एक जीवन होता है वह मौत के बाद भी कुछ जगह दी और आत्मा के रहने वाले के रूप में उस जगह पर रहता है।

( Memory Pillars of Gamawada )
The large-sized pillars made of stone invite the visitors to have a glance at the age old trs.adition and culture of the local tribes. These pillars which were erected centuries back by the local inhabitants are basically the memory pillars staunched to their deceased relative

 पातालकोट क्षेत्र 

पाताल में बसा एक ऐसा गांव, जहां सूरज की रोशनी नही पहुचती

देवेन्द्र कुमार शर्मा ११३,सुंदरनगर रायपुर छ.ग.
छिंदवाडा से दिल्ली के रोहिल्ला सराय स्टेशन तक जाने वाली ट्रेन “पातालकोट एक्सप्रेस’ का नामकरण इस क्षेत्र के नाम पर ही किया गया है |

पातालकोट क्षेत्र 

 आज मै आपको प्रकृति की गोद में बसे ऐसे अद्भुत गांव समूह के बारे में बता रहा हु, जिसके बारे में शायद ही आप जानते हों। आप पाताल के बारे में किस्सों में सुनते आए हैं। लेकिन क्या आपने कभी वास्तविक जीवन में पाताल देखा है? नहीं न, तो यह जानकर आपको खुशी होगी कि हमारे ही देश में एक ऐसा स्थान है, जो पाताल का दूसरा रूप है। उस अद्भुत जगह का नाम  है -  पातालकोट 

मै वर्ष 1999मे परिवार सहित निजी वाहन से जून के माह मे पंचमढ़ी जा रहा था।
सिवनी ,के आगे रात होने लगी थी,. छोटे बच्चे भी साथ मे थे । अतः विचार किया गया की. छिंदवाडा रात रूककर वहां से सुबेरे मे पंचमढ़ी के लिए निकला जावे।
जिस होटल मे ह्म लोग रुके थे वहां के लोगो से आगे और देखने के लायक जगह की जानकारी ली तो पातालकोट और तामिया की जानकारी मिली ।.
छिंदवाडा से चलकर लगभग 09 बजे तामिया से 5-7 km पहले तक  पहुंचे हि थे । यहां पर पातालकोट व्यू पॉइण्ट जाने का रास्ता मे लगा हुआ बोर्ड लगा दिखा ।.जो की यहां से करीब 20 किलोमीटर दूर है। यहीं से पातालकोट का रास्ता अलग होता है।
रास्ता के दोनों और के नज़ारे सुन्दर है। ऊंची-नीची जमीन है । ह्म किलोमीटर के पत्थर देखते हुए हम आगे बढते जा रहे थे।एक जगह तिराहा मिला, यहां बोर्ड लगा था कि पातालकोट (रातेड) व्यू पॉइण्ट के लिये बायें जायें और चिमटीपुर व्यू पॉइण्ट के लिये सीधे जायें। हम बाये मुड़ पड़े। दो किलोमीटर बढ़ते ही सडक घास के एक मैदान में समाप्त हो गई। यहां एक वाच टावर बना था ताकि लोगबाग पातालकोट को निहार सकें।
ह्म स्वयं भी रेलिंग के सहारे सामने देखते हुये आश्चर्य चकित थे ।
यहां से आगे का नज़ारा बिल्कुल पाताल लोक जैसा ही था। सीधी खडी गहराई।
और उसके अन्दर फिर उतनी ही गहराई मे बसे लोग .इसका पातालकोट नाम इसी गहराई की वजह से पडा है । बिल्कुल पाताल लोक जैसे हजारो फीट की गहराई। पाताल अर्थात अनन्त गहराई वाला स्थान। यहाँ कोट का अर्थ है- चट्टानी दीवारों, दीवारे भी इतनी ऊँची, कि यदि आप पहाडी की तलहटी में खड़े हैं, तो लगता है जैसे आप पहाड़ से घिर गए हैं। सिर्फ उचे उचे पहाड़ ही नज़र आयेंगे .
मानो धरती के गर्भ में समाया है। तकरीबन 89 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली यह एक घाटी है जो सदियों तक बाहरी दुनिया के लिए अनजान और अछूती बनी रही।

प्रकृति की गोद में बसा यह पाताललोक सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच 3000 फुट ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं से तीन ओर से घिरा हुआ है। इस स्थान पर दो-तीन गांव तो ऐसे हैं जहां आज भी जाना नामुमकिन है। ऐसा माना जाता है कि इन गांवों में कभी सवेरा नहीं होता। जमीन से काफी नीचे होने और विशाल पहाड़ियों से घिरे होने के कारण इसके कई हिस्सों में सूरज की रौशनी भी देर से और कम पहुँचती है,मानसून में बादल पूरी घाटी को ढक लेते हैं और बादल यहाँ तैरते हुए नजर आते हैं। इन सब को देख सुन कर लगता है कि मानो धरती के भीतर बसी यह एक अलग ही दुनिया हो।
 सतपुड़ा की पहाड़ियों में करीब 1700 फुट नीचे बसे ये गावं भले ही तिलिस्म का एहसास कराते हों लेकिन यहाँ बसने वाले लोग हम और आपकी तरह हांड-मांस के इंसान ही हैं, यह लोग भारिया और गौंड आदिवासी समुदाय के हैं जो अभी भी हमारे पुरखों की तरह अपने आप को पूरी तरह से प्रकृति से जोड़े हुए हैं सूर्य की रोशनी यदि पहुचती भी है तो कुछ देर के लिए ही।.
पैराणिक कथाओं के अनुसार यह वही स्थान है, जहां से मेघनाथ, भगवान शिव की आराधना कर पाताल लोक में गया था।
यही नहीं, यहां के स्थानीय लोग आज भी शहर की चकाचौंध से दूर हैं। उन्हें तो पूरी तरह से यह भी नहीं मालूम की शहर जैसी कोई भी चीज भी है। औरचारो तरफ ऊँचे ऊँचे पहाड़ लेकिन नीचे में लोग रहते भी हैं और गांव भी हैं। खूब घना जंगल है और आना-जाना पैदल ही होता है।


स्थानीय आदिवासी उस जगह पर जडी-बूटियां और स्थानीय पैदावार बेच रहे थे। एक तो यह इलाका ही बेहद दुर्गम है, फिर पातालकोट- यहां कोई स्वास्थ्य सुविधा नहीं है। आदिवासी स्वयं ही अपना उपचार करते हैं और कुदरत ने इनके जंगल में खूब जडी-बूटियां उगा रखी हैं। ये लोग इनका प्रयोग करना जानते हैं।
उनसे बातचीत मे पता चला की पातालकोट में 12 गाँव अन्दर समाये हुए हैं।  .एक गाँव में 4-5 अथवा सात-आठ से ज्यादा घर नहीं होते। पातालकोट में 12 गांव समाये हुए हैं ये गांव हैं- गैलडुब्बा, कारेआम, रातेड़, घटलिंगा-गुढ़ीछत्री, घाना कोड़िया, चिमटीपुर, जड़-मांदल, घर्राकछार, खमारपुर, शेरपंचगेल, सुखाभंड-हरमुहुभंजलाम और मालती-डोमिनी।
  सभी गाँव के नाम इनके  संस्कृति से जुड़े-बसे हैं। भारियाओ के शबदकोष में इनके अर्थ धरातलीय संरचना, सामाजिक प्रतिष्ठा, उत्पादन विशिष्टता इत्यादि के अनुसार  समेटे हुए नाम  है।

पातालकोट के दर्शनीय स्थल में, रातेड, कारेआम, नचमटीपुर, दूधी तथा गायनी नदी का उद्गम स्थल और राजाखोह प्रमुख है। आम के झुरमुट, यह आने वालो  का मन मोह लेते हैं। आम के झुरमुट में शोर मचाता- कलकल के स्वर निनादित कर बहता सुन्दर सा झरना, कारेआम का खास आकर्षण है।
यहां रुकने का एकमात्र स्थान जंगल वालों का रेस्ट हाउस है और वो बिल्कुल पहाड़ के खडे किनारे पर बना है। वही असल में चिमटीपुर व्यू पॉइण्ट है जिसके बारे में पीछे बोर्ड पर लिखा था।

रेस्ट हाउस से तीन किलोमीटर पीछे ग्राम छिन्दी के पास फॉरेस्ट रेंज ऑफिस है। इसकी बुकिंग केवल वहीं से होती है

रविवार, 16 अक्टूबर 2016

चिड़िया पकड़ने का फंदा ( trap to catch birds)

ये शिकारी है “ जो की चिड़िया पकड़ने का फंदा बना रहा है | छोटा सा दरवाजा बनाने के लिए जैसा बांस को मोड़ के उसमे धागे को बुनते हैं |बन जाने पर फिर इसे झाडी के पास में लगाते हैं, और इसके बीच बीच में अनाज का दाना डाल देते हैं | चिड़िया लालच मे एक से दुसरे में फिर दुसरे से तीसरे फंदे में घूमते जाता है और उसका पैर या पंख कहीं ना कहीं फंस ही जाता है |” और शिकारी इन्हें पकड़ लेते है| और बेच देते है|
“This one is a trap to catch birds. Small pieces of bamboo bent into doors like with woven threads between. These are placed in bushes with grains for birds to eat. While the birds move among doors, legs or wings get stuck somewhere.”

शनिवार, 15 अक्टूबर 2016


 मुर्गे का घर /  बकरे का घर 






बाया चित्र मे " जी हा ये यह मुर्गे का घर है। शाम को जंगल एरिया मे मुर्गे को यहां रखते है। शुरू मे दिक्कत होती है फिर आदत हो जाने से वो खतरा भाप कर खुद इसमे घूस जाते है। घर मे इनके रखने से मुर्गे गंदगी करते है, और उसका बदबू भी आता। ऐसा अलग अलग रखने से इनकी परवाह भी नहीं करना पड़ताहै। साथ हि रात को जंगली जानवर का भी डर नहीं। साप काटने का भी डर नही। इसलिए ये इस तरह के घर मुर्गे के लिए बनाते है। 
दाये चित्र मे "" यह जंगल एरिया मे बकरे का रहने घर है। इसके पास जितने बकरे होते  है, उतना ही संख्या मे  जंगली जानवर से बचाव के लिये घर बनाकर इसी में ये रात मे बकरे को रखते है। जमीन से ऊपर रहने से तो जंगली जानवर नहीं खायेंगे? सुरक्झित रहेंगे .  इनके स्वयं  के घर  छोटे होने के कारण इन्हें इसप्रकारकी व्यवस्था करनी होती है
दिन में बकरे को नीचे छोड़ देते है। वे जंगल में चरने चले जाते है। बरसात के दिनों में बैलों के साथ चराते है। धूपकाल में छोड़ देते है। खाली जमीन में बांधेने से बकरे बीमार हो जाते । फिर मर जाते। इसीलिए ऐसा घर बनाते है.ताकि स्वस्थ रहे .

पाव भाजी PAV BHAJI स्ट्रीट फूड्स STREET FOOD 

लोकप्रिय भारतीय फ़ास्ट फ़ूड ( POPULAR FAST FOOD ) और स्ट्रीट फ़ूड ( STREET FOOD ) 

डी.के.शर्मा 113,TRIMURTY CHOWK सुंदरनगर रायपुर छ.ग.

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 मैं हमेशा प्रयास करता हूँ की कुछ नया, कुछ दिलचस्प आपको बताऊँ जो हकीकत जगह से या पीढ़ी दर पीढ़ी से आया हो । 
हम भारतीयों की एक खास आदत है कि घर में कितना भी लजीज पकवान क्यों न बना लें परन्तु स्ट्रीट फूड्स के प्रति हमारी दीवानगी कभी भी  कम नहीं हो सकती | मसालों की राजधानी भारत को कहा जाता है |   यहां के किसी भी  शहर मे  में जब आप कहीं बाहर घुमने निकलते हैं तो ढेर सारे लजीज फूड आपको अपने स्वाद  व सुगंध (टेस्ट एवं  अरोमा) से स्वागत करते नज़र  देते हैं |
छोले भठूरे, छोले कुलचे, पराठे, आलू-पूरी, मसाला डोसा, इडली सांभर के साथ एक डिश जो सबसे ज्यादा पसंद की जाती है वो है पावभाजी| जी हाँ.. पाँवभाजी का टेस्ट ही कुछ ऐसा है कि चाह के भी यदि आप  भूखे हो और स्टाल सामने हो तो आप अपने आप को रोक नहीं पाएंगे | मूलतः मुंबई के स्ट्रीट फूड्स की पहचान बन चुकी पाँवभाजी धीरे-धीरे न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में अपने टेस्ट से सबको दीवाना बना रही है |
पाव भाजी एक प्रमुख पश्चिम भारतीय नाश्ता हैं। विशेष रूप से महाराष्ट्र में इस नाश्ते का काफी प्रचलन हैं खासकर के मुंबई की पाव भाजी विश्व प्रसिद्ध है। पाव भाजी शब्द मराठी भाषा के पाव और भाजी से बना है। पाव भाजी बच्चों को भी बहुत पसंद आती है. पाव एक प्रकार की डबल रोटी होती है और भाजी कई सब्जिया जैसे टमाटर, फूल गोभी,शिमला मिर्च आदि को घी अथवा मक्खन में पका कर बनाई जाती है।
 पाव शब्द की उत्पत्ती पुर्तगाली शब्द पाओ (pão) से मानी जाती है।पाव भाजी खाने में बहुत ही स्वादिष्ट होती है। आपके यहाँ मेहमान आए हों या कोई पार्टी हो, आप बड़ी आसानी से पाव भाजी बना सकती हैं क्योंकि इसे बनाना बेहद आसान है और इसे बनाने में समय भी कम लगता है।
पाव भाजी में, पाव के साथ मैश / मसली हुई भाजी खाई जाती है।
पाव भाजी अपने आप में पूर्ण  है क्यूंकि इसके साथ किसी अन्य व्यंजन को परोसने की ज़रुरत नहीं पड़ती।  इसके अलावा मुंबई खाने के लिए भी बहुत फेमस है, मुंबई भेल व मुंबई पाव भाजी   वैसे तो सब जगह खाई जाती है,मुम्बईया पाव भाजी काफी लोकप्रिय street food  है जो बहुत चटपटी और स्वादिष्ट होती है |
 वैसे आजकल तो हर जगह ही पाव भाजी के ठेले लगने लगे हैं किन्तु  यहा की  बात ही कुछ और है ।
पाव भाजी को आप नाश्ते के जैसे, पार्टी में, रविवार को ब्रंच के जैसे या फिर जब भी मन करे बना कर खा सकते हैं और सर्व कर सकते हैं.  अब क्योंकि इसमें बहुत सारी सब्जियाँ हैं और फिर पाव भी है तो यह तो भरा पूरा खाना हो ही  जाता है, अगर आप चाहें तो साथ में मट्ठा या फिर कोई और देसी ड्रिंक भी सर्व कर सकते हैं.पाव भाजी खाने में ‌जितनी स्वादिष्ट होती है बनाने में उतनी ही आसान। पाव भाजी को बनाने में समय भी कम लगता है। आपके यहां मेहमान आये हों या किटी पार्टी हो या कोई भी ओकेजन, आप पाव भाजी बनाकर अपने दोस्तों को खिला सकती हैं, ।
पावी-भाजी अमूमन सभी को पसंद होता है। जब भी चौपाटी से हम गुजरते हैं और भाजी की महक हम तक पहुंचती है तो बरबस ही हमारे पैर स्टॉल की तरफ चले जाते हैं। 
पाव भाजी बनाने की अनेको   प्रकार की  रेसिपी होती हैं
 भारतीय फ़ास्ट फ़ूड ( Fast Food ) और स्ट्रीट फ़ूड ( Street Food ) बनाने में बहुत ही आसान और काफी सस्ते होते है । 

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

अपने अपने रीतिरिवाज

मध्य प्रदेश ,odissa ,मलकानगिरी और पातालकोट के आसपास व और कही ,कही गोंड़ परिवार की शादी के समय मे“ दूल्हा के सभी भाई बहन उपवास रखते है | बारात जाने से पहले ये सब एक रस्म करते हैं | वो यह की बर्तन में तेल उबलते रहता है, उसमें " गुलगुला "(Sweet Dish) तलेंगे | वो गुलगुला को दूल्हा के भाई बहन हाथ से निकालते हैं | तेल सच में बहुत गर्म होता है, जिसमे आपका हाथ तो जल जायगा पर उनके भाई बहन का नहीं जलता है |”
 जी हा देखा न ,,अलग अलग जगह अलग अलग रीती रिवाज़.