गुरुवार, 25 अगस्त 2016

मुर्गा लड़ाई . ट्राइबल एरिया के गांव कस्‍बों में मनोरंजन का साधन (  कुकड़ा गाली उर्फ़ मुर्गा बाज़ार  )






मुझे याद है अपनी नौकरी के शुरुवाती  दिनों  की है।   मैंने ट्राइबल एरिया से नौकरी शुरू की थी । कुछ गाव बस्तर जिले के गावो से काफी नजदीक लगे हुए थे । 
 बस्तर में मुर्गा लड़ाई को आदिवासियों की संस्कृति से जोड़कर देखा जाता है । व गाव में बाजार के दिन जाना पड़ता था।
मै देखता था की कुछ लोग बगल में मुर्गा दबाये उसे काफी लाड प्यार से उसे  ले जा रहे है। पता लगा की इन गावो में मुर्गा लड़ाई होता है.।
 इसके बारे में पता करने पर ज्ञात हुआ की , मुर्गा लड़ाई'  रोचक होती है.। गांव कस्‍बों में यह मनोरंजन का हिस्‍सा है।
लड़ने के लिए मुर्गा को खास तौर पर न केवल प्रशिक्षण दिया जाता है, बल्कि उसके खान-पान पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है।
बस्तर में मुर्गा लड़ाई के लिए कई क्षेत्रों में मुर्गा बाजार भी लगाया जाता है।
 इतिहास के पन्नों में मुर्गा लड़ाई की कोई प्रमाणिक जानकारी तो नहीं मिलती, लेकिन आदिवासी समाज में मुर्गा लड़ाई कई पीढ़ियों से आम जिंदगी का मनोरंजन का हिस्सा बना हुआ है।
भले ही दुनिया पशु-पंक्षियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हों, मगर बस्तर व् लगे हुए धमतरी ,व् बालोद जिले के इलाके में मुर्गा लड़ाई सबसे बड़ा और लोकप्रिय गेम था । बाजार के पीछे मुर्गे की लड़ाई का अखाड़ा सजा रहता था और माड़ी, हंडिया, देसी दारू और अंगरेजी शराब के नशे में टुन्न लोग एक-दूसरे की मुर्गे की जान लेने को आतुर मुर्गे पर दांव लगाते रहते थे।

वैसे तो मुर्गे की लड़ाई का खेल आदिवासियों के लिए सदियों पुराना है, बताते है की काफी पहले इस खेल में मुर्गे की जान नहीं जाती थी,।
लेकिन मेरे देखते में आदिवासियों के इस पारंपरिक खेल के वक्त मुर्गे के पंजे में तीखे नश्तर बांधे जाते है । 
लड़ाई में प्रशिक्षित मुर्गे उतारे जाते हैं. लड़ने के लिए तैयार मुर्गे के एक पैर में अंग्रेजी के अच्छर 'यू' आकार का एक हथियार बंधा हुआ होता है जिसे 'कत्थी' कहा जाता है। 
 ऐसा नहीं  की यह कत्थी कोई भी व्यक्ति बांध सकता है. इसके बांधने की भी कला है. कतथी बांधने वालों को कातकीर कहा जाता है जो इस कला के माहिर होते हैं
.कत्थी बांधने के बाद मुर्गे लड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं.।

जब दो मुर्गे लड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं तो दर्शक के रूप में उपस्थित लोग अपने मनपसंद मुर्गे पर दांव लगाते हैं 
मुर्गे की लड़ाई आमतौर पर 10 मिनट तक चलती है. इस दौरान मुर्गे को उत्साहित करने के लिए मुर्गाबाज (मुर्गा का मालिक) तरह-तरह का आवाज निकालता रहता है 
जिसके बद मुर्गा और खतरनाक हो जाता है.लड़ने के लिए मुर्गा को खास तौर पर न केवल प्रशिक्षण दिया जाता है,।
मुर्गे आपस में कत्थी द्वारा एक दूसरे पर वार करते रहते हैं. इस दौरान मुर्गा लहुलूहान हो जाता है. कई मौकों पर पर तो कत्थी से मुर्गे की गर्दन तक कट जाती है. मुर्गो की लड़ाई तभी समाप्त होती है जब एक मुर्गा घायल हो जाए या मैदान छोड़कर भाग जाए.
 एक अन्य मुर्गाबाज ने मुझे चर्चा में बताया कि मुर्गो को विशेष रूप से तैयार करने के लिए उसको पौष्टिक खाना तो दिया ही जाता है
कई बार ऐसे मुर्गो को मांस भी खिलाया जाता है । लड़ाकू बनाने के लिए मुर्गो को ना केवल मादा मुर्गे से दूर रखा जाता है, बल्कि उसे कई दिनों तक अंधेरे में भी रखा जाता है.।
दरअसल, झारखंड , व् छत्तीसगढ़ के व् सभी छेत्र के आदिवासिओं का प्रकृति के साथ पशु-पक्षियों से भी दोस्ताना संबंध रहा है। 
आदिवासियों के खेल और मनोरंजन की परिधि भी पेड़-पौधे और पशु-पक्षियों तक में सीमित रही है। लेकिन, अब सट्टेबाजों की वजह से मुर्गे की लड़ाई का खेल ज्यादा ‘कातिलाना ’ बन गया है।
बहरहाल, मेले में प्रतिद्वंदी मुर्गे के पंजे में बंधी तीखी छुरी से जख्मी हो जाने के बाद भी मुर्गा फिर से लड़ने और मरने को तैयार हो जाता है।
 अब प्रशासन की नज़र में नही आने लोग लुक छिप कर इस गेम को खेलते है व् जितने वाला मृत मुर्गे को अपने  साथ में ले जा कर रात की पार्टी मनाता है।
कुछ बाजारों और मेलों में 'मुर्गा लड़ाई' का खास प्रकार का आयोजन किया जाता है 
कई इलाकों में प्रतियोगिता भी  आयोजित होती है। क्या कभी आपने भी देखि है इन मुर्गो की लड़ाई।
 

ग्राम ठकुराइन टोला खारून नदी मध्य उत्तराभिमुख शिव मन्दिर

भी १४ अगस्त को मैं और मेरा छोटा भाई अपने पैतृक ग्राम में स्वयं और भाई के खेतो के मेढ पर आम , कटहल, बिही ,करौंदा तथा मूंनगा के पेड़ लगाने की विचार से साथ में लेकर गए थे। ताकि सावन  का  अंतिम दिन  में १५ अगस्त की पूर्व संध्या पर 
कम से कम  हमारे लगाए पेड  आने वाली पीढ़ी को हमारी याद तो  दिलाएगा।   काफी पहले हम लोगो का सम्मिलात काफी बड़ा आम का बगीचा रहा है। जिसे लोगो ने पैसे कमाने के लोभ में पेड़ो की बिक्री कर खेती जमीन में तब्दील कर दिया ।  अब यह ग्राम भी दुर्ग से अभनपुर तक के मार्ग पर बीच में आने से यातायात काफी बढ़ गया है। और खेती कार्य करने में श्रमिको की दिक्कतों का सामना भी करना होता है। क्योंकि अब बहुत से लोग शहर की और काम करने पलायन करने लगे है।
खैर जब हम लोग शाम को रायपुर की और वापस होने लगे तो ग्राम खट्टी के समीप भाई ने बताया की थोड़े दूर में ही राजिम के कुलेश्वर महादेव के तर्ज़ पर शिव मंदिर है। सावन का अंतिम दिन है चलकर दर्शन लाभ कर लेते है। और हम लोग वहां तक पहुच गए।

यह मंदिर रायपुर से भाटागांव से दतरेंगा ,परसदा से आगे खट्टी ग्राम लगभग 18 -20 k.m. तक आते है तो गांव से खारुन नदी तक जाने का c.c. मार्ग है , नदी पर बने पल को पार करने खारून नदी और दक्षिण दिशा से ही बह कर आते हुए नाले की संगम मध्य पर बना हुआ हमे बायीं और मंदिर दिखता है ।


 और हम यदि दुर्ग या पाटन मार्ग से आते है तो 18 किमी दूर मोतीपुर ग्राम है औऱ यहाँ से पाटन जाने के लिए दो मार्ग हैं। एक मार्ग ग्राम फुंडा होकर जाता है और दूसरा मार्ग झींट होकर बायीं दिशा में जाता है। झींट होकर जाने वाले मार्ग पर 13 किमी की दूरी पर तुलसी ग्राम है और तुलसी ग्राम की बस्ती पार करने पर बाँयीं ओर कच्ची सड़क पर 3 किमी की दूरी पर खारून नदी के किनारे ग्राम ठकुराइन टोला है। ग्राम में निषादों का बहुतायत है। सन् 1942 में और 1947 में पुनः नदी में भयानक बाढ़ आने पर इसमें यहाँ के जान-माल को काफी क्षति पहुँची तब ग्रामवासियो ने निर्णय लिया था कि अब इस ग्राम को किसी ऊँचे टीले पर बसाया जायेगा, ।

और अब की बार निषादों ने खारून नदी से आधा कि मी दूर पीछे हट कर बस्ती बसाई। इसलिए यहाँ खारून नदी के तट पर कोई गाँव नहीं है, बस दोनों दिशा में मन्दिर ही मन्दिर नज़र आता है ।
जब हमने लोगो से बात की तो उन्होंने बताया की सन् 1941 में किसी निषाद दल के मुखिया (लोगो ने राजा कहा ) के राजिम प्रवास के दौरान में महानदी, सोंढूर और पैरी के संगम में कुलेश्वर महादेव के मंदिर को देखकर मन में यह बात आई कि ठकुराइन टोला में भी खारून नदी की और नाले के मध्य धारा में एक ऐसा हि भव्य मन्दिर का निर्माण किया जाए । उन्होंने निषाद समाज के प्रमुख लोगों से परस्पर मंत्रणा की और निषादो ने आपसी सहयोग से मन्दिर बनवाने की योजना बनाई गई।


नदी के बीच के पत्थरों को ही कुशल शिल्पकारों द्वारा वर्गाकार काटने का सिलसिला प्रारम्भ हुआ और लगभग आधी शताब्दी तक काम चलने के बाद सन् 1980 तक जगती का काम पूरा हुआ। जगती के ऊपर शिव मन्दिर उत्तराभिमुख निर्मित है।

 गर्भगृह में शिवलिंग की पीठिका भी उत्तराभिमुख है, पर जल-प्राणालिका दक्षिण में है। मंदिर के निर्माण का कार्य सन् 1984 में पूर्ण हुआ था। धमतरी के निकट के किसी ग्राम के शिल्पकार हरि राम द्वारा निर्मित शिवलिंग की भव्य प्रतिमा इस मन्दिर में स्थापित है।
अभी जब हम लोग गए थे तो लेकिन मंदिर तक पहुचने का मार्ग छोटा है किन्तु पत्थर पर कई जमा होने और घाट के बाद नुकीले पत्थर होने से फिसलन योग्य है। तथा सीढ़ी के बीच के अंतर की उचाई बुजुर्गो को तकलीफ दे सकती है। मंदिर में दत्तात्रेय और बाल्मीकि तुलसी तथा अब देवी की भी की मूर्ती स्थापित है। तथा पास ही नदी का पानी रोके जाने से और गिरने से काफी अच्छा दृश्य लगता है। किन्तु ग्राम वासियो को दोनों किनारे पर सघन वृक्छारोपण करना चाहिए। तथा वह तक पहुचने के मार्ग को निर्माण कराये जाने की आवश्यकता है।












इंजीनियरिंग की मिसाल पेश करती सदियो से भूसे को बचाती है पत्तो से बनी " छनेरा "
कुछ वर्ष पूर्व मैं खरगोन तथा बड़वानी जिले की और से गुजर रहा था। मुझे ग्रामीण एरिया की और जिले के आदिवासी क्षेत्रो में घरो के पास झोपड़ीनुमा बनी चीज़ ने काफी ध्यान खींचा। बाद में मैंने वहां के स्थानीय निवासियों से इस सम्बन्ध में और जानकारी प्राप्त की। पता लगा कि इसका नाम " छनेरा " है।
जिले की आदिवासी क्षेत्रो में सदियो से चली आ रही छनेरा बनाने का काम अभी भी बदस्तूर जारी है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होने वाली झाडि़यो (आइपोमिया) बेशरम ,बांस से बनी यह छनेरा वर्षाकाल में पशुओ को दिये जाने वाले भूसे का ख़राब होने से बचाती है।
स्थानीय स्तर पर लगे पेड़ो की डालियो, बांस की खपचियो व घास-फूस से बनी इन छनेरा में आदिवासी अपने खेतो में लगे गेहूं से निकलने वाले भूसे को वर्षा के पानी से बचाने हेतु सहजते है।
देखने में कमजोर लगने वाली इन छनेरा को इतनी बारिकी व कुशलता से बनाया जाता है कि खुले में बनी इन छनेरा में वर्षा का एक बूंद पानी भी प्रवेश नही कर पाता। जिसके कारण इसमें भरा भूसा हवा-पानी से पूरी तरह सुरक्षित रहता है।
इन छनेरा के नीचे की तरफ एक वर्ग फुट से कुछ छोटा एक दरवाजा भी बनाया जाता है। इसी दरवाजे के माध्यम से भूसा निकालकर पशुओ को खाने के लिए दिया जाता है।
इंजीनियरिंग की मिसाल पेश करती इन छनेरा की संख्या आदिवासी अपने खेते से निकलने वाले भूसे व पाले गए पशुओ की संख्या के अनुसार बना कर रखते है। अलबत्ता इन छनेरा का आकार-प्रकार लगभग एक जैसा ही रहता है। इसका कारण यह है कि इस परिमाप की बनी छनेरा में भरा भूसा नीचे बने दरवाजे तक बिना किसी परिश्रम के स्वतः ही आता रहता है। अगर आपको पशुओ को निकालकर भूसा नही खिलाना हो या घर के सभी सदस्य कुछ दिनो के लिए बाहर जा रहे हो तो छनेरा में नीचे बने निकासी दरवाजे को खुला छोड़ दे। पशु निकासी दरवाजे में बारी-बारी से मुंह डालकर भूसा खाते रहेंगे। चूंकि उपर से भूसा स्वतः नीचे आता रहता है, इसलिए पशुओ को भूखा नही रहना पड़ता।
गज़ब का है न ग्रामीणों में भी किसी चीज़ को सहेजने ,और सही तरीके से उसके उपयोग हेतु दिमाग ,आप क्या कहते है ?

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 उसकी कमीज  मेरी कमीज से उज़ली कैसे

वह बड़े साहब के सामने दुम हिलाता है तो  कनिष्ठ व् चपरासी के सामने शेर बन   )


मध्यवर्गीय  परिवार का सदस्य भी  एक अजीब  सा जीव होता है ,क्युकी एक और  उसमे उच्च वर्ग का अहंकार तो दूसरी और निम्न वर्ग की दीनता होती है। अहंकार और दीनता से मिलकर बना उसका व्यक्तित्व बड़ा ही विचित्र होता है। वह बड़े साहब के सामने दुम हिलाता है तो  अपने से कनिष्ठ व् चपरासी के सामने शेर बन जाता है। मज़ेदार बात जब होती है जब वो अपने से कनिष्ठ को ज्यादा सुख पूर्वक बैठे देख ले। तुरंत ही उसके पेट में गुड गुड गुड चालू हो जाता है। कि  उसकी कुर्सी मेरी कुर्सी से अच्छी क्यू …,,,,,,?  ऐसे ही बात हरिशंकर परसाई जी ने अपने एक व्यंग में लिखा था।
 मैंने सामन्यतः देखा है की आज भी लोग गुलामी की  मानसिकता    से ऊपर नही उठ पाये है ,इनके लिए अच्छा काम करके ,लोगो की दिल जीत कर साहबी करना नही आता। ऐसे लोग लोगो को परेशान करके रुआब गाठ अपना सिक्का जमाना  चाहते है।
 बिचारे नही जानते है  की उनकी साहबी को लोग उनके कुर्सी के सामने खड़े रहने तक ही  मानते है। 
 कुर्सी के पीछे   हंसी -मज़ाक के लिए  वे रोजाना  के  विषय है।
 आज  काम करने का युग है। काम करने वाले की इज़्ज़त है न की काम को लटकाने  हेतु  नियम खोजने वालो की। भारत में ढीला शासन की बदनामी कराने वाले ऐसे ही लोग है शामिल है  ।
सरकारी तंत्र में लीडरशिप की बात यदि करे तो मैंने अनेको अधिकारी को जो की जिम्मेदार पदो के शीर्ष  में  बैठे हुए रहते है ,को अपने टेबल में फाइलों के ढेरो के बीच चिड़चिड़ाते ,बौखलाते  हुए  बैठा  पाता हु।  फाइल को  वे न तो यस ही कर पाते  है  और न ही नो कर पाने की हिम्मत   है। डर  अलग बैठा है की फस न जाऊ।
कोई सामने आया  तो कटकन्ने कुत्ते जैसे भोक दिया ,नेता आया तो पूछ हिला दिया।
 ऐसे लोग  न तो फायर ही कर पाते है और न ही उसे झेल पाते है।  वे  भगवान  के भरोसे आगे ही आगे बढ़ते जाते है। ऐसे लोग  सोचते है की उनके सारे कुकृत्य दूसरे की सर में चढ़ जाये। और वह स्वयं  साफ सुथरा  सत्यवादी हरिस्चन्द्र की भांति  दीखता रहे" भैया।  स्वयं में तो दम नही और सोच में  हम किसी से कम नही "     और ऐसे ही इनकी जिंदगी कट जाती है। 

Saturday, 24 January 2015

 बाबू शब्द की उत्पत्ति कैसे हुयी....क्या आप जानते है ?आज के ज़माने में अगर कोई भी सरकारी काम  किसी से निकलवाना है तो बाबू भइया को खुश रखना आवश्यक है। मुझे लगा की इस शब्द की उत्पत्ति क्यों और कहा  से हुयी है की जानकारी शायद आपको भी  हो ? नही न  ,  यदि जानना चाहते है  तो … क्या कहते है आप ? बाबू शब्द  हम लोगों ने अपने आसपास काफी  सुना है...... हम प्यार से  भी लोगों को बाबू कहते हैं, और अपने बच्चों को भी  भी बाबू कहकर पुकारते रहे है।   सरकारी कार्यालय में  क्लर्कों को भी बाबू  भैय्या ही तो कहते हैं ......या तो  कह लें कि  हम काम निकलने के लिए  उनकी  चापलूसी करते हैं...... और वे भी  बहुत खुश होते हैं....... अगर कोई उन्हें  प्यार से बाबू
कहे...... मतलब यह है की .....हम भारतीय... बाबू को  बहुत ही सम्मानजनक नाम के रूप में ही  लेते हैं..........लेकिन! क्या हमने कभी यह सोचा है की इस बाबू शब्द की उत्पत्ति कैसे और कहा  से  हुयी है? आखिर  जरा  सोचे तो भला   की ये शब्द  आया तो आया  कहा  से  ?
 क्या  आप कभी  मुंबई में नेहरू प्लेनेटोरियम के बगल में एक गोल बिल्डिंग है जिसमें इतिहास की समग्र जानकारी को पर्मानेंट प्रदर्शनी के
तौर पर रखा गया है, देखने को गये है। इस प्रदर्शनी को देखते हुए काफी अलग अलग किस्म की  रोचक जानकारीयां मिलती है। जिनके बारे में फिर कभी ?
वही  पर  एक जगह एक दरवाजा बना हुआ है  है जो कि किसी अंग्रेज के घर का है। घर में टंगे पोस्ट बॉक्स के बगल में एक ओर तख्ती लगी है जिस पर लिखा है - Dogs and Indians are not allowed  और इस तरह की तख्ती हिल स्टेशन  शिमला मसूरी  की मॉल रोड में भी लगी मिल जाती थी। या फिर  सिविल लाइन एरिया में भी जहा  की वे लोग रहते थे ।
इसी बात से पता चलता है कि अंग्रेज हमारे लिये कैसा व्यवहार रखते थे।
 अंग्रेज़ों ने हम पे जैसा की  सबको मालूम है की दो सौ साल तक भारत में  राज किया.... और हम हिन्दुस्तानियों को  इस दौरान बहुत ही हेय निगाह से देखा  करते थे।  उस वक्त अंग्रेज़ों के घरों और सरकारी दफ़्तर  में हिन्दुस्तानी लोग ही  नौकर थे..... उन लोगों को अँगरेज़ उनके रंग और डील डोल देख कर   बबून (baboon) पुकारते थे..... ( बबून (baboon) एक प्रकार का बन्दर प्रजाति का जानवर है.... जो कि अफ्रीका में पाया जाता है......जिसका मूँह कुत्ते जैसा और धड़ बन्दर जैसा होता है)
 तो भाई! ये अँगरेज़ लोग हम हिंदुस्तानिओं को बबून(baboon) कह कर हि  पुकारते थे..... जो कि अपभ्रंश होकर बाबू हो गया..... वैसे भी  हम हिन्दुस्तानियों को अंग्रेज़ों कि अंग्रेज़ी समझ में  ज्यादा तो  आती थी , नही  ....  तो जब अँगरेज़ हम हिन्दुस्तानियों को बबून (baboon) बुलाते थे..... तो हम हिन्दुस्तानियों कि उनके उच्चारण से  यह लगता  था..... कि यह लोग हमें प्यार से बाबू बुलातेहैं...... और ऐसा अँगरेज़ उस वक्त ज़्यादा करते थे जब उनके घर में कोई विलायत से मेहमान आता था..... यहाँ तक कि उस वक्त के I.C.S. Officers को भी अँगरेज़ बबून ही बुलाते थे..... .... और हम हिन्दुस्तानी भी ऐसे थे.... कि अपने घर जा कर उस वक्त लोगों को बड़ी खुशी खुशी बताते थे कि अँगरेज़ हमें प्यार से बाबू बुलाते हैं..... बेचारों को क्या मालूम था कि अँगरेज़ हमें  अपनी भाषा में गालियाँ दे रहें हैं..... बबून कह के...क्युकी इस शब्द के बारे में उन्होंने  ज्यादा नही सोचा। और  गूगल बाबा तो  थे नही जो की उन्हें बबून के फोटो दिखाते।    अंग्रेजो के चमचे  पढ़े लिखे भारतीयों ने भी   न ही  कभी  कोई आपत्ति ली। आज़ादी के बाद धीरे - धीरे यह शब्द हमारी आम ज़िन्दगी में प्रचलन में आ गया......
बाबूजी "बाबू" के सम्बन्ध में वैसे मेरी  इस  बात से पूरी तरह सहमत यदि नही हो तो  एक और पक्ष से भी आपको  वाकिफ करना चाहूँगा। जो की ज्यादा मान्य और लोगो को पसंद  है  वह यह की ब्रिटिश शासन के दौरान जब कोलकाता एकीकृत भारत की राजधानी थी, कोलकाता को लंदन के बाद ब्रिटिश साम्राज्य का दूसरा सबसे बड़ा शहर माना जाता था। इसी दौरान बंगाल और खासकर कोलकाता में बाबू संस्कृति का विकास हुआ जो ब्रिटिश उदारवाद और बंगाली समाज के आंतरिक उथल पुथल का नतीजा  ही कहा  जा सकता है। उस समय  वहां  पर  बंगाली जमींदारी प्रथा हिंदू धर्म के सामाजिक, राजनैतिक, और नैतिक मूल्यों में उठापटक मचा हुआ था । और इन्हीं द्वंदों का नतीजा था कि अंग्रेजों के आधुनिक शैक्षणिक संस्थानों में पढे कुछ लोगों ने बंगाल के समाज में सुधारवादी बहस को जन्म दिया। मूल रूप से "बाबू" उन लोगों को कहा जाता था जो पश्चिमी ढंग की शिक्षा पाकर भारतीय मूल्यों को हिकारत की दृष्टि से देखते थे और खुद को ज्यादा से ज्याद पश्चिमी रंग ढंग में ढालने की कोशिश करते थे। लेकिन लाख कोशिशों के बावज़ूद भी  जब अंग्रेजों के बीच जब उनकी अस्वीकार्यता बनी रही।  तो बाद में  इसी वर्ग के कुछ लोगो ने नयी बहसों की शुरुआत की जो बंगाल के पुनर्जागरण के नाम से जाना जाता है। इसके तहत बंगाल में सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक सुधार के बहुत से अभिनव प्रयास हुये और बांग्ला साहित्य ने नयी ऊँचाइयों को छुआ जिसको बहुत तेजी से अन्य भारतीय समुदायों ने भी अपनाया। और इन्ही पढ़े लिखे लोगो की जमात बाबू कहलाने लगी.शायद
इसलिए बंगाली लोगों को आज भी बंगाली बाबू ही  कहा जाता है.
बाबू शब्द पिता के लिए भी प्रयोग होता है..... अब क्यूंकि हम भारतीय बाबू शब्द को सम्मान की नज़र से देखते हैं..... तो यह शब्द हम बड़ों बूढों को इज्ज़त देने के लिए भी इसका प्रयोग करने लगे.....फर्क बस इतना है की हमने बाबू के साथ जी भी जोड़ दिया वो बाबूजी हो गया..... अगर देखा जाए तो हम एक तरह से इस नाम का  बेईज्ज़ती ही कर रहे थे .....
हमें बाबूजी नहीं बोलना चाहिए.था .... मतलब हम बेईज्ज़ती भी सम्मान के साथ कर रहे हैं..... अब  एक और पक्ष  को ले तो ,शायद   यह बाबूजी भी नहीं था.... यदि था तो  ..  हमारी संस्कृति में यह बाउजी था..... जो आपक़ो हरयाणा की संस्कृति को  देखने में  मिल जायेगा..... बाउजी शब्द ही  आगे चल कर धीरे धीरे बाबूजी हो गया......... यह वही बाबू हैं जिन्होंने अंग्रेजों से वेस्टर्न शिक्षा ग्रहण की.... और अँगरेज़ उनको भी बाबू ही बोलते थे..... जिसको बंगाल के संस्कृति ने अपना लिया.... अब जब इंसान पढ़ लिखा लेता है.... तो दिमाग खुल जाता है ..... और बंगाली उस वक़्त अंग्रेजी शिक्षा के ज्यादा करीब थे..... लेकिन बंगालिओं ने अंग्रेजों से सीख के हम भारतियों को ज्ञान ही दिया..... इसलिए बंगाली लोग खुद को बाबू कहलाना पसंद करते थे...... क्यूंकि उनको भी लगता की ..... अँगरेज़ उन्हें प्यार से बाबू कह रहे हैं.....बहुत खूब.. भई हम तो प्यार से लोगों को बाबू कहकर ही बुलाते हैं
बाबू शब्द का विश्लेषण और उसमे छिपे हुए अर्थ को जानकर अज़ीब सा लगा. हम अक्सर इसे तो सम्मान देने के लिये प्रयोग करते थे. बाबू हम छोटे बच्चे के लिये भी प्रयोग करते थे. अब पता चला कि इसमे कितनी हिकारत भरी है.
 बस  भैय्या अब   इस सम्बन्ध में ज्यादा नही,  क्युकी किसी बाबू जी ने  कही पढ़ लिया न, तो लेने के देने न  पड़  जायें ।

तुरतुरिया माता सीता का आश्रय स्थल 

 blogger - DKSHARMA 113,sundarnagar Raipur


 सर्वप्रथम  इस जगह  पर मै  और  मित्र श्री नारद चौधरी जी उनके बुलेट से सिरपुर और बार नयापारा  टूर के दौरान गए थे । तबकि  मुझे याद है की महासमुंद  से सिरपुर  होते हुए कसडोल जाते समय पुल - पुलिए  तेज वर्षा की वजह से बाढ़ की चपेट में  आ गए थे।और  हम दोनों को सिरपुर  के पुराने विश्रामगृह  में  रात व्यतीत  करना पड़ा  था। और सुबेरे मौसम खुलने पर जैसे तैसे  तुरतुरिआ  देखते हुए कसडोल पहुंचे थे। वैसे वे   इस स्थल में  पहली बार मेरे साथ ही पहुंचे थे। बाद में  मुझे इस स्थल में अनेको बार जाने का मौका मिला है।  आज छत्तीसगढ़ का नाम  पुरातात्विक सम्पदा  से भरपूर  सिरपुर आदि के कारण  भारत  में ही नही बल्कि  विश्व मे भी अपनी एक अलग   स्थान  बनाता  जा  रहा  है।




    कैसे  पहुंचे :-
 तुरतुरिया रायपुर जिला से 84 किमी एवं बलौदाबाजार जिला से 29 किमी दूर कसडोल तहसील से १२ किमी दूर प०ह्०न्० ४ बोरसी से ५किमी दूर और् सिरपुर से आने पर   23 किमी की दूरी पर   घोर वन प्रदेश के अंतर्गत  स्थित है। तब तो  मार्ग   जंगल वाले थे।  अब  पक्के मार्ग बन चुके है।




  यह   स्थान आसपास के छेत्र  में   सुरसुरी गंगा के नाम से भी प्रसिद्ध है । यह स्थल प्राकृतिक दृश्यो से भरा हुआ एक मनोरम स्थान है जो कि  चारो और से जंगल पहाडियो से घिरा हुआ है। इसके समीप ही छत्तीसगढ़  का प्रसिद्ध अभ्यारण बारनवापारा   भी स्थित है। यहा  पर  अनेको  प्रकार के  वन प्राणी  ,फ़्लोरा व् फौना मिलते है।
  तुरतुरिया बहरिया नामक गांव के समीप बलभद्री नाले पर स्थित है। एक बार  जब हम लोग जीप से सुबेरे के  समय यह पहुंचे थे ,तो नाले के आसपास  गौर ,हिरण ,भालू आदि  वन प्राणी  देखने को मिले थे।मैंने एक विशालकाय मादा भालू को अपने दो बच्चो को पीठ में चढ़ा कर रास्ता पर करते भी देखा है। और वापिसी के दौरान एक नीलगाय ने सड़क के किनारे लगे पत्थर के दीवारो को छलांग लगा कर हमारे सामने ही दौड़ते देखा है। वो हमारे मोटर साइकिल से टकराते टकराते बचा था।   किवदंती  है कि त्रेतायुग मे महर्षि वाल्मीकि का आश्रम यही पर था और यही जगह  लवकुश की भी जन्मस्थली थी।

  इस स्थल का नाम तुरतुरिया होने का कारण  शायद यह है कि बलभद्री नाले का जलप्रवाह चट्टानो के माध्यम से होकर निकलता है तो उसमे से उठने वाले बुलबुलो के कारण तुरतुर की ध्वनि निकलती है। जिसके कारण उसे तुरतुरिया नाम दिया गया है।



 इसका इक जलप्रवाह एक लम्बी संकरी सुरंग से होता हुआ आगे जाकर एक जलकुंड मे गिरता है जिसका निर्माण प्राचीन ईटों से हुआ है। जिस स्थान पर कुंड मे यह जल गिरता है वहां पर एक गोमुख बना दिया गया है जिसके कारण जल उसके मुख से गिरता हुआ दृष्टिगोचर होता है। गोमुख के दोनो ओर दो प्राचीन पाषाण   प्रतिमाए किसी वीर की स्मृती  में स्थापित है जिसमे  कि इक  हाथ में तलवार लेकर  सिंह  को   मारते हुए हुए खड़ा है  ,और दूसरी मूर्ति जानवर से लड़ाई करता हुआ  उसकी गर्दन को मरोढ़ता  हुआ  है। यही पर  विष्णु जी की भी दो प्राचीन  मूर्तीया  है।   जिनमे से एक प्रतिमा खडी हुई स्थिति मे है तथा दूसरी प्रतिमा मे विष्णुजी को शेषनाग पर बैठे हुए दिखाया गया है।  इस स्थान पर शिवलिंग भी खुदाई  आदि में भी  मिलते रहते  है..  इसके अतिरिक्त प्राचीन पाषाण स्तंभ भी काफी मात्रा मे बिखरे दिखते  है जिनमे कलात्मक खुदाई किया गया है। जिससे लगता है की यह स्थल पूर्व में विकसित रहा होगा।  इसके अतिरिक्त कुछ प्राचीन  शिलालेख और  कुछ प्राचीन बुध्द की प्रतिमाए भी यहां स्थापित है।  यह  स्थल  बौध्द, वैष्णव तथा शैव धर्म से संबंधित  संप्रदायो की कभी  मिलीजुली संस्कृति रही होगी ऐसा प्रतीत होता है । समीप  ही नारायणपुर , शिवरीनारायण वैष्णव व्  शैव  धर्म के  धार्मिक स्थल  व् सिरपुर  बौध्द संस्कृति का भी  केन्द्र रहा होगा। आध्यात्मिक व्  पुरातात्विक  ये  स्थल इस बात को बल भी देती है।  ऎसा माना जाता है कि यहां कभी महिला  बौध्द विहार भी  थे जिनमे बौध्द भिक्षुणियो का निवास था। समीप ही  सिरपुर के  होने के कारण यह माना जा सकता है की  कि यह स्थल कभी बौध्द संस्कृति का भी  केन्द्र रहा होगा। विशेषज्ञों ने  ऎसा अनुमान लगाया गया है कि यहां से प्राप्त प्रतिमाओ का समय 8-9 वी शताब्दी है। आज भी यहां स्त्री पुजारिनो की नियुक्ति होती है जो कि एक प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा है।  यहां पूष माह मे तीन दिवसीय मेला लगता है जिसमे  बडी संख्या मे आसपास के ग्रामवासी आते है। धार्मिक एवं पुरातात्विक स्थल होने के साथ-साथ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण भी यह स्थल पर्यटको को अपनी ओर खींचता रहता  है। पिकनिक  मनाने भी लोग आते रहते  है।

माता सीता का आश्रय स्थल




 इस जगह  के विषय में कहा जाता है कि लंका विजय से वापस आने के बाद   श्रीराम द्वारा  माता सीता  को त्याग दिये जाने पर माता सीता  को   इसी स्थान पर वाल्मीकि  मुनि जी ने अपने आश्रम में  उन्हें आश्रय दिया  था। और उनके पुत्र  लव-कुश का भी जन्म यहीं पर हुआ   माना  जाता है ।  महर्षि वाल्मीकि को रामायण के रचियता भी माना जाता है. और इस लिए  यहहिन्दुओं की अपार श्रृद्धा व भावनाओं का केन्द्र भी माना जा सकता  है



पुरातात्विक महत्त्व
सन 1914 ई. में सर्वप्रथम  तत्कालीन अंग्रेज़ कमिश्नर एच.एम. लारी ने इस स्थल के इतिहास  को समझ  यहाँ पर पुरातात्विक खुदाई करवाई, जिसमें अनेक मंदिर और सदियों पुरानी मूर्तियाँ प्राप्त हुयी थीं। यहाँ वर्तमान में  पर कई मंदिर बनते जा रहे  है। नज़दीक ही  एक धर्मशाला भी  बना हुआ है।
मातागढ़' नामक मंदिर
यहँ पर 'मातागढ़' नामक एक अन्य प्रमुख मंदिर है, जहाँ पर महाकाली विराजमान हैं। नदी के दूसरी तरफ़ एक ऊँची पहाडी है। इस मंदिर पर जाने के लिए पगडण्डी के साथ सीड़ियाँ भी बनी हुयी हैं।मातागढ़' नामक एक अन्य प्रमुख मंदिर है जहाँ पर महाकाली जी  स्थापित  हैं। मातागढ़ में कभी बलि प्रथा होने के कारण बंदरों की बलि चढ़ाई जाती थी, लेकिन अब पिछले कई सालों यह बलि प्रथा बंद कर दी गई है। अब केवल सात्विक प्रसाद ही चढ़ाया जाता है। लोक  मान्यता है कि मातागढ़ में एक स्थान पर वाल्मीकि आश्रम तथा आश्रम जाने के मार्ग में ही  जानकी कुटिया है,जहा ही  सीता जी रहती थी।
मैंने पाया की वर्तमान में यह पर मंदिर के आलावा अन्य सामान्य सुविधा  खाने -पीने की वस्तुये   मेला के समय को छोड़कर अनुप्लब्ध  ही रहता है। अतः आप आते है तो पूरी व्यस्था के साथ ही आवे। किन्तु यहाँ  पर आवै  तो गंदगी न फैलावे यह ध्यान में रखे  ।
 (चित्र  गूगल से साभार  व् अन्य ब्लॉगर के सहयोग से  )


" मेरी पहली हवाई यात्रा "

 (बादलो के ऊपर जहा  और भी है )

                                                  देवेन्द्र कुमार शर्मा  सुन्दर नगर रायपुर

हम लोगो ने बचपन से   अनेको  बार हवाई जहाज  को उड़ते  देखा   है , जब तक की वह  सिर के ऊपर से पुरी तरह से गुजर कर नज़र से ओझल  न  हो जाए।  लेकिन उस पर चढ़ने का स्वप्न  देखने की गलती मैंने  कभी भी  नहीं की थी  । बचपन में  समीप  से एक बार हवाई जहाज को माना  एरोड्रम से  उड़ते हुए  हुए देख कर   खुद को भाग्यशाली मानता   था  ।


 ये अलग बात है  की अब वो बात मुझे  कभी कभी  बचपना सा लगता है ।मेरी पहली हवाई यात्रा   कुछ ऐसी ही रही जिसकी कल्पना भी मैं नहीं कर सकता था और वो हो भी गई यूं ही अचानक। प्लेन देवता ने भी सोचा होगा डी के तू कब  तक  मुझमे बैठने से  बचेगा और एक बीमारी मुझे लगा दी ,डाक्टरों ने हमे  इतना डराया की मैंने भी सोचा कि अब ज्यादा दिन का मिहमान तू नही है ,मुझे भी लगा की भैय्ये मरने से पहले ही जिन्दा रहते पुष्पक विमान में चढ़ लू   ।  मरने के बाद क्या पता जमीं मार्ग से ले जाये। स्थिति ऐसी हो गई थी  की बस अब मुंबई तो  जाना ही है।  और जल्दी ही और कल ही ,चाहे तो  हवाई यात्रा भी चलेगी । मरता न क्या करता ,चलो भाई  . आपने  भी सुना होगा गुग्गुल की जड़ी बूटी दवाई के रूप में  काम आता ही है  । ये कैसा होता है कभी जानने की कोशिश तो  नहीं की। पर परिजनों ने वैसा ही कुछ मिलता जुलता नाम का उपयोग कर  गुग्गुल डाट काम  इंटरनेट में – फ्लाईट खोजने में उपयोग   किया। और मिला एक –  जेट एयर वेज़  । शब्दार्थ खोजा तो पता चला –जेट वायु मार्ग
 वैसे  जेटएयर वेज़ के प्रचार में नीली  ड्रेस में एयर होस्टेस एकदम परी सी लग रही थी ।  अब क्या था – हम  इस मुसीबत की दुनिया से काफी उपर, नील आकाश में  परियों के साथ यात्रा  करने वाले थे,शुरु हो गयी तैयारी । टिकट बुक करवाया इंटरनेट से ।

  किन्तु मन को लगा की मोबाइल में टिकट कैसे हो सकता है भाई मगर विश्वास नहीं हुआ कि बिना लाईन में लगे खुद से प्रिटिंग किया हूआ  अपना कागज टिकट कैसे हो सकता है ।  फिर खुद को ऐसे मनाया कि मेरे को ठग सकते है सभी को थोड़े ही न ठगेंगे  साथ में तो दुनिया से परिचित मेरे साले साहब    व् बेटा भी तो संग में है न  ।  कुछ भी हो ,मैंने समझदार यात्री बन  ,  पहले तो  टिकट के ऊपर  छपे नियम-कानुन को  ध्यान से पढ़ा । देखा एक ही बैग ले जाने को कहा है – उसकी लंबाई – चौड़ाई – ऊँचाई – भार, 35 किलो सब निर्धारित है । एक अलग से लैपटाप  भी आप  चाहे तो ले जा सकते है । चलो  ठीक है ।
उस दिन फ्लाईट शाम को थी । मेरे  बीबी  जिसके पास निर्देशो का पुरी रेडीमेड पोटली रहती है को  मैनें न छेड़ी । क्युकि  पता था – अगर पोटली इकबार  खुली तो, शांति का आशा नहीं थी । और उस दिन को मैं पुरी शुभ यात्रा बनाना चाहता था । फिर किसी को जान बुझकर दुखी करके यात्रा थोड़े ही न बनता है । सो मैनें थोड़ी  ही   बात की, वो खुश और मैं भी खुश । बाई – बाई फिर आफलाईन ।हमारे बहुत सारे साथिओ  के लिए तो  हवाई यात्रा, आटो रिक्शा जैसा है  । मैं  सोचता था की एक बार खाली चढ़ तो लुँ, हवाई जहाज पर, अन्य हवाई यात्रिओ की तरह अपना भी जन्म सार्थक हो जाए ।
वैसे ही पहले बार ही मुंबई छोटे इंजीनियर  बेटे के  पोस्टिंग  के बाद जा रहा था – वो भी हवाई जहाज से । वहाँ घर पे सब  डॉक्टर  के  कथन  से – दुखी हो मेरे घंटे गिन रहे थे । मै भी सोच में  था कि  पता नही क्या हो सशरीर इसी हालत में  लौटूंगा की नही ,  खैर हम एयरपोर्ट पहुंचे पहूँचकर देखा तो सब स्टेन्डर्ड यात्री । ज्यादातर बढ़िया सुटकेश और बढ़िया बैग लेकर चलने वाले ।
 इधर हमारे  रेलवे ,और बस स्टेशन पर तो झोला वाले  या फिर  सस्ते सुटकेश व् बैग वाले  ही  खुब दिखते हैं,ठीक  भी है ,मैंने अपनी आँखों से कीमती  या  बढ़िया सुटकेश वालो को लूटते ,चोरी होते  हुए भी खूब देखा है मन में प्लान हो गया कि अगली बार के लिए एक हवाई यात्रा लायक सैमसोनाईट सुटकेश  जिसका विज्ञापन  अधिक दिखाते है  वाला ही खरीदना होगा ,

 आखिर हमारे  भी तो कुछ  सम्मान  है की नही  । अभी जो भी , जैसा है, ठीक है।  खैर हमने भी अपना बैग का चेन आदि चेक कर  सामान जमा लिया। मेरी आदत खुद हि इस काम को करने की रहती है। ताकि बाद में असुविधा न हो।
पीयू  (सिस्टर इन लॉ की बेटी )जो कि  मुंबई में   इंजीनियर  है , हमेशा ही  प्लेन में ही  आती जाती रहती  है  ,ने फ़ोन में  बता दिया था कि पुरी जाँच पड़ताल होती है, सीट नम्बर भी वहीं मिलेगा इसलिए एक घंटा पहले  ही पहुंच जाना चाहिए । हम   घर से बिदा लेकर २० की. मी. दूर  विवेकानंद एरोड्रम में  पहुंच गए। एक सिक्योरिटी गार्ड ने बेटे के  हाथ में ई-टिकट देखकर आईडी कार्ड और टिकट चैक करने के बाद  कहा कि आप चाहें तो वहां( दूसरे गेट) से भी एंट्री कर सकते हैं। वहाँ जाकर देखा, बस फर्स्ट क्लास वेटिंग रुम जैसा कुर्सी की लाईन।

 और साफ सुथरा वातावरण।  मैंने पहली बार किसी भी एयरपोर्ट पर पहली बार कदम रखा था ।  हम   जहाँ “चेक इन” लिखा देखा –   खड़ा हो गए  । हम पुरा एक घंटे पहले पहुंचे  थे  ना इसलिए  लाईन  में नबंर एक  पर थे । पुरे बीस मिनट खड़े  रहे वहीं  पीछे मुड़ कर देखा तो लंबी लाईन लगी थी । मैं पुरा गौरवान्वित महसुस कर रहा था उस समय , नहीं तो मुझे एक बार लेट से स्टेशन पहूँचकर चलती गाड़ी में चढ़ने का बुरा अनुभव रहा है । पॉकेट से पैसे अलग साफ । चेक – इन शुरु हो गयी । मेरे सामने एक पट्टी  चलने लगी । एक स्टाफ ने डाल दिया मेरा बैग उस पट्टी पे ।  बेचारा बैग – बिना मालिक का चला गया, एक छोटी सी अँधेरी सुरंग  में ।

 मैंने  एक्स रे करवाया था दो सौ रुपये लगे थे । अरे वाह, और यहाँ सामान का एक्स रे भी फ्री । हमें बगल के दुसरे रास्ते से टिकट देखकर जाने दिया । साले साहब को   बैग  अंदर जाकर नहीं मिला ,मैं वहाँ खड़ा रहा । हमारे   पीछे खड़े कई महाशय अपना सुटकेश लेकर चले गये । उसके बाद दो लोग और  अपना सामान लेकर चले गये । अब  हमारा दिमाग ठनका – कुछ गड़बड़ हुआ है । उनका  बैग देखा तो जाँच करने वालों ने उठाकर रख लिया था । और उन्हें खड़ा देख जाँच करने वाला पुछा – “ये आपका बैग है क्या , पता चला है कि इसमे कोई ठोस चीज़ है ।” “अरे  यार, एक्स रे मशीन तो उस्ताद है “- मैनें सोचा । उन्होंने   कहा “टोर्च  हैं “। उसने  बैग खोलने को कहा – “चैक होगा “। फिर वे  संतुष्ट हो गये  कि ये   उग्रवादी (टाईप) नहीं है  । और  मुक्ति मिली । नही तो बैग से पैक्ड सामान को निकालकर फिर से डालना भी बड़ा कष्टकर होता है ।
 उनलोगों नें उसे पुरा सुरक्षा स्टीकर से सील कर  किया उधर मेरा बैग एक  ने वहीं पर ले लिया । देखा चली गयी बेचारी बैग – फिर एक रोलर  पे  चलती पट्टी में । अब   पारी आई शरीर  और ,मोबाइल के चेक की.मैं देख रहा था कि एक ट्रे में सब मोबाइल और पर्स तक निकाल के रख रहे हैं । रह गया हाथ में सिर्फ बेटे की  अपना हैडबैग। जिसका भी एक्स-रे किया जा चूका था।  ये गार्ड सिर्फ आईडी प्रुफ और बोर्डिंग पास चैक कर रहे थे। मेरे आईकार्ड और बोर्डिंग पास चैक होगया और जैसे ही मैंने आगे बढ़ने की कोशिश की तभी मुझे एक गार्ड ने रोक दिया।
मुझे लगा कि जरूर से ही कोई बात होगी। पता चला कि नहीं आगे वालों की चैकिंग नहीं हुई है तो मुझे और मेरे पीछे की जनता को रोक दिया गया।निपट कर   हवाई अड्डे से सभी लोग अपना सामान (हैंडबैग) लेकर प्लेन पर  चढ़  रहे थे  ,  मैंने सोचा  किस्मत मेरी अगर तेज रही तो ही मिलेगी, खिड़की वाली सीट । पहली बार की यात्रा तो ठहरी न।  , खैर मेरे साइड खिड़की मिल गई।

खैर मैं भी हवाई जहाज पे जा रहा था जो की  ट्रेन की यात्रा से  काफी बेहतर है , अब  सीढ़ियां हटा ली गईं थी। एयरहोस्टेस जो कि उदघोषिता भी थी उसने सूचना दी कि थोड़ी देर में फ्लाइट उड़ने के लिए तैयार है और उदघोषणा बंद होगई।धीरे-धीरे विमान जोरो से   गड गड की आवाज़ करते हुए  बस  की तरह  सरकने लगा और रनवे तक पहुंच गया। विमान थोड़ा रुका और मैंने धरती को जी भरकर पास से देखा व्  अपने बगल में बांयी और की विंग को देखने लगा। विमान रनवे पर चल दिया फिर तेज आवाज़ के जरिए दौड़ने लगा। बस एक छोटे से हल्के झटके के साथ प्लेन  आसमान की तरफ बढ़ गया। धरती पीछे और नीचे छूटती जा रही थी और मैं लगातार नीचे देखता जा रहा था। पर ये क्या, प्लेन की लेफ्ट विंग नीचे की तरफ क्यों झुक रही है। मेरा तो कलेजा मुंह को ही आ रहा था और मैं नीचे देखने से डरने लगा।खैर थोड़ा ऊपर जाकर विमान ठीक से चलने लगा। और एक एयर होस्टेस को कई तरह से मुसीबतों से बचने के नियम कानून ..हाथ को व्यायाम की  मुद्रा में हिलाते देखा ..कुछ समझ आया कुछ नहीं . एहसास हो रहा था कि जैसे चढ़ाई में कुछ दिक्कत हुई है और अब वो समतल सड़क पर ठीक से चलने लगा है। और प्लेन में काफी आवाज़ हो रही थी। लेकिन ऊपर  से धरती को देखना का सुख मुझे बहुत ही प्रफुल्लित कर रहा था। साथ ही लग रहा था कि गूगलअर्थ में जो चित्र उभरते हैं वो सचमुच में ही काफी सही और जीवंत लगते हैं।नीचे धरती, उसके ऊपर बादल, उसके ऊपर हमारा विमान और हमारे विमान के ऊपर सिर्फ और सिर्फ साफ आसमान।  फिर  विमान परिचारिका आयी और अपने साथ  एक टेबल नुमा ट्रे लेकर  नास्ते की चीज लेकर  निकली और पूछा  कि  नाश्ता चाहिए क्या , और  पानी की  बोतल। लोगो ने  नाश्ता  लिया हमारी पहले ही  पेटपूजा हो गई थी , फ़िर वही परिचारिका आकर नाश्ते की प्लेट ले गयी, चूँकि नाश्ते की प्रक्रिया के लिये बहुत ही सीमित समय होता है, तो विमान की सारा स्टॉफ़ बहुत ही मुस्तैदी से कार्य कर रहा था। जैसे ही उन लोगों ने नाश्ते की प्लेट्स ली सभी से वैसे ही कैप्टन का मैसेज आ गया कि आप छत्रपति शिवाजी विमानतल पर उतरने वाले है और फ़िर मौसम की जानकारी दी गई। उससे पहले खिड़की से नजारा देखा तो पूरी मुंबई एक जैसी ही नजर आ रही थी, पहचान नहीं सकते थे कि कौन सी जगह ह

 सुदूर  फ्लैट की रंगबिरंगी  बत्तियों के बीच से उतरना भी इक  रोमांचक अनुभव रहा. मुम्बई एरोड्रम  में  लगता है कि हर 05 मिनट में प्लेन उड़ते और उतरते रहते  है .

  सिर्फ पौने दो घंटे में मैं मुंबई पहुंच गया। पूरी उड़ान के वक्त मैं एक अलग एहसास होता रहा जो कि बिल्कुल अलग था। खैर नीचे उतरते ही रनवे  से बस एरोड्रम के लिए   लग जाती है । वहा से सामान लेकर  निकले. और  वहा  पर मेरे छोटे बेटा जो कि टैक्सी लेकर इंतेजार मे  था  के  साथ आगे बढ़ लिये..,,,,,,,,,, ।